श्री योगेश्वरजी की आत्मकथा

उजालों की ओर

'प्रकाश ना पंथे' का हिन्दी भावानुवाद

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७. मेरे मातापिता

 

रुखीबा की तरह हमारा घर भी गरीब था । मातापिता की आर्थिक स्थिति बिलकुल सामान्य थी । वो खास पढे-लिखे भी नहीं थे । वैसे भी गाँव में पढाई पे ज्यादा ध्यान नहि दीया जाता था । खास करके स्त्रीयों को पढाने की बात लोगों को कुछ अजीब लगती थी । इसी कारण गाँव में महिलाओं के लीए पाठशाला नहि थी । अक्सर छोटे-छोटे बच्चों की शादी होती थी । ज्यादातर लोग अपने घर की बेटीयों की हो सके उतने जल्दी शादी कराने की फिराक में रहते थे । ऐसे माहोल में मातापिता के पास से भी शिक्षा की अपेक्षा रखना कुछ ज्यादा ही था । हमारे घर में खेतीबाडी ही जीवनयापन का मुख्य साधन था । पिताजी का नसीब कुछ ऐसा था की वो महेनत तो बहुत करते मगर किसी न किसी कारण खेती में बाधा पैदा हो जाती । परिणामस्वरूप घर की आर्थिक स्थिति कभी भी अच्छी नही हुई । वैसे घर में खाने की समस्या नहीं थी । घर में घी-दूध उचित मात्रा में उपलब्ध रहते थे । मातापिता स्वभाव से संतोषी थे ।

पिताजी का स्वभाव अच्छा था । उनका शरीर भी तंदुरस्त था । गाँव में वक्त आने पर सुरक्षा के लिए वो सदैव आगे रहते थे । उन्होंने किसी का कुछ बिगाडा नहि था । एसा सोचने की उन्हें फुरसत भी नहि थी । दिन का ज्यादा वक्त वो खेतीबाडी में ही व्यतीत करते थे । अपनी छोटी सी दुनिया में वो अपने आप को सुखी समजते थे । गाँव के लोग आज भी उनकी सराहना करते है ।

किसान को दुनिया का तात कहा जाता है वो सही मायने में यथार्थ है । कृषि को हमारे यहाँ बरसों से उत्तम व्यवसाय माना गया है । उसमें प्रकृति के साथ आदमी का संयोग तो होता ही है पर साथ-साथ कपट किये बिना कमाई हो सकती है । आजकल कृषि में भी कुछ विकृतियाँ जरूर आयी है मगर फिर भी ओर व्यवसायों से वो ज्यादातर शुद्ध रहा है । प्रमाणिकता से अपना जीवन चलानेवाले एसे किसान के घर में पैदा होने के लिए मैं गर्व महसुस करता हुं । गरीबों के खून चुसके अमीर हुए कोइ धनवान व्यकित के घर में पैदा होने के बजाय महेनत और इमानदारी से अपना जीवन-निर्वाह करनेवाले एक किसान के घर में पैदा होने में मैं ईश्वर की कृपा समझता हूँ । वैसे तो जन्म और मृत्यु ईश्वर के आधीन है फिर भी मेरा एक किसान के घर में पैदा होने में ईश्वरकी इच्छा ही कारणभूत थी ।

मेरे माताजी में भी बचपन से ही धार्मिक संस्कार थे । उनकी शादी छोटी उम्र में हुइ थी । गाँव से थोडे दूर सिद्धेश्वरी माता के मंदिर में उन वक्त बोधानंद और सोमेश्वरानंद नामक दो साधुपुरष वास करते थे । पानी भरने की वाव का रास्ता भी वहीं से निकलता था । माताजी अक्सर पानी भरने के लिये जाती तब उन साधुपुरषों के दर्शन का लाभ लेती । बोधानंद वैदक में कुशल थे । माताजी का घरसंसार सुखी नहि था । श्वसुर पक्ष की ओर से उन्हे बडी मुश्केली होती थी । उसी वजह से एक बार उन्होंने आत्मघात का प्रयास भी कीया था । किस्मत से वो बाल-बाल बच गई । बोधानंद के पास जाने में एक ये भी प्रमुख कारण था । बोधानंद ने एक बार उनको मंत्रवाली सोपारी भी दि थी मगर उनका कोइ असर नहि हुआ । जब तक व्यवहारिक जीवन रहा, माताजी को मानसिक अशांति भुगतनी पडी ।

किसान के घर में जन्म लेने से मेरा जीवन भी कुछ किसान की तरह ही हो गया है । जैसे की किसान को कुदरत के सानिध्य में आनंद मिलता है वैसे ही मुझे कुदरत के सानिध्य में अपार शांति मिलती है । किसान का दुसरा गुण स्वावलंबन है । मेरे जीवन में भी उसका विशेष महत्व रहा है वो तो ये कथा पढनेवाले वाचक को पता चल ही जायेगा । पुर्खों से चली आई खेतीबाडी और बेल जोतने का काम तो मैं नहीं कर रहा हूं फिर भी अब भी मैं किसान तो हूँ ही । अब मैं जीवन की खेती करता हूँ । संयम और श्रद्धा के बैल से जीवन को खोदकर, ईश्वर के प्रेम का बीज बोता हूं । भक्ति की बारिश और ज्ञान के सूर्यकिरणों से उसमें सिद्धि ओर शांति की पेदाईश होती है । यह फसल उगाने का मेरा व्यवसाय तो अभी भी कायम है ।

 

 
 

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