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सांकुबा
पिताजी
को कृषि
में सहयोग प्रदान करती थी । वो बडे ही महेनती और बहादुर थी । खेतों में
पानी मोडना व कोस चलाना उनके लिए मानो बाँये हाथ का खेल था । वो पढी-लिखी
नहीं थी किन्तु ईश्वरमें उनकी बडी आस्था थी ।
कुछ
लोगों को अपने बचपन की बातें ठीक तरह से याद रहती है । बचपन के कई
छोटे-मोटे किस्से वे हुबहु बयाँ कर सकते है । ऐसा सिर्फ युवानों में ही
नहीं लेकिन बुझुर्गो में भी पाया जाता है । जब अपने अनुभव प्रस्तुत करने
की उनकी बारी आती है तो वो उनको इतनी बारीकाइ से पेश करते है की
सुननेवाले भी दंग रह जाते है । उनकी स्मरणशक्ति पर हमें आश्चर्य एवं आदर
होता है । एसे लोग बुढापे में भी अपनी बीती हुई जिंदगी को याद करके फिर
बचपन के दिनों का आस्वाद ले लेते है ।
मेरी
बात कुछ अनोखी है । मेरे बचपन के अधिकतर प्रसंग मुझे याद ही नहीं । ये
बात का मुझे कोइ गम नहीं । ये बात ठीक है या नहीं इसकी चर्चा मैं यहाँ
नहीं करना चाहता । यहाँ पर तो मुझे जो भी कुछ याद है वो मैं बताने की
कोशिश कर रहा हूँ । जन्म-मरण के चक्र में युँ तो हम अनगिनत बार जन्म ले
चुके है और बचपन बीता चुके हैं । हम में से किसीको उनके बारें में कुछ
याद नहीं । इसके लिए हमें खेद भी नहीं होता तो फिर इस बचपन की कुछ
स्मृतियाँ याद न रहने से भला मैं क्यूँ शोक करुँ
?
ये जीवन भी कहाँ हमेशा रहनेवाला है
?
इसलिए मुझे जीतना भी याद पड़ता है उससे मुझे खुशी अवश्य होती है मगर मैं
जो भूल चुका हूँ उसका मुझे कोई गम नहीं ।
बचपन
में मुझे उदर की व्याधि रहा करती थी । मेरे माताजी के बताने पर मैं यह कह
रहा हूँ । मेरी यादशक्ति तेज थी । गाँव में रमताशंकर नामक एक सज्जन पुरुष
रहते थे जो सब बच्चों को संध्या करना सिखाते थे । उन्हीं से मैं संध्या,
रुद्री व शिवमहिम्न के पाठ सिखा । हररोज शिवजी के मंदिर में मैं संध्या
करने जाता था ।
बचपन के
दिनों को बीतते हुए देर लगती है भला
?
जब सारा जीवन ही पानी की तरह क्षण में बह जाता है तो बचपन का तो क्या
कहना ?
जीवन के आठ साल तो यूँ करके बीत गये और मेरा नवाँ साल में प्रवेश हुआ ।
ये साल मेरे जीवन में क्रांतिकारी साबित हुआ । श्रावण सुद बारस को मेरा
नौवें साल में प्रवेश हुआ और भाद्रपद में पिताजी को चेचक की बीमारी हुई ।
कुछ ही दिनों में वो चल बसे । जवानी में मौत होने से कुटुंब में हाहाकार
हो गया । गाँव के लोग भी उनकी भलमनसाई को याद करके शोक करने लगे । मेरी
माँ की उमर उस वक्त सिर्फ पचीस साल की थी । उनका सौभाग्य खंडीत हुआ इसलिए
वो भी शोक में डूब गई । शोक का वो समय मुझे थोड़ा-थोड़ा याद है ।
लेकिन
शोक करने से क्या होता है ?
जो चला जाता है वो वापिस तो नहीं आता । जन्म और मृत्यु तो सनातन है ।
सबको एक न एक दिन उसका महेमान होना ही है । जो परमात्मा की भक्ति करके
उसको पा लेता है वो ही उन पर विजय पाता है । और वैसे भी जन्म व मृत्यु तो
एक दूसरे के पूरके है, साथी है । एक जगह सूर्य का अस्त होने से क्या
सूर्य का नाश होता है ?
वो तो कहीं ओर निकलता है । एक जगह का सूर्योदय किसी औरों के लिए
सूर्यास्त है बिल्कुल उसी तरह जन्म और मृत्यु का भी है । इसलिए उनका
हर्षशोक कैसा ?
जो भी ईश्वर के चरणों में प्रेम करता है उसका सौभाग्य कभी नष्ट नहीं होता
। मौत उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकती । संसार के सब ऐश्वर्य क्षणभंगुर है,
विनाशशील है, शाश्वत नहीं । ये शरीर भी उसी तरह शाश्वत नहीं, उसका अंत
कभी न कभी तो होना ही है । धीरा भगत ने गाया है कि
काच नो
कूपो काया तारी,
वणसताँ
न लागे वार ।
जीव
काया ने सगाई केटली,
मूकी
चाले वन मोझार ।
अर्थात्
तेरी काया काँच के बरतन की तरह क्षणभंगुर है । उसे टूटते देर न लगेगी ।
जीव व काया की सगाई क्या है ?
वह तो काया को जंगल के बीच छोड़कर चला जाता है ।
लेकिन
अधिकांश लोग ऐसे विवेकज्ञान से वंचित है इसलिए शौक करते है । हमारे घर
में भी मातम छा गया । इतना कम था कि पिताजी के मृत्यु ते पंद्रह दिन के
बाद शौक का एक और प्रसंग आ धमका । हम तीन भाई-बहन थे उसमें सबसे छोटी बहन
की मृत्यु हो गई ।
ईश्वर
की लीला अपार है । वो जो भी करता है वो मंगलमय ही है एसा अनुभवी संतो का
मानना है । पिताजी के मृत्यु के बाद ईश्वर की कृपा से मेरे लिए एक योजना
बनाई गई । माताजी के बड़े भाई रमताशंकर चौपाटी में किसी शेठ के घर चपरासी
की नौकरी करते थे । उनके मकान के पास ही अनाथ बच्चों के लिए एक आश्रम था
। उन्हों ने उसमें मेरे प्रवेश के लिए अरजी दी और वो मंजूर हो गई । उस
जमाने में बंबई पढ़ने के लिए जाना हमारे पिछड़े हुए गाँव में रहनेवालों
के लिए लंदन जाने के बराबर था । कई गाँववालों ने यह बात का विरोध किया ।
लेकिन मेरी दृढ़ इच्छा थी । ईश्वर की भी मेरे लिए यही योजना थी । मानो
मेरे पूर्व-संस्कार मुझे वहाँ जाने के लिए खींच रहे थे । माताजी और उनको
दोनों भाई यह प्रस्ताव पर जूटे रहे और किस्मत ने मुझे बंबई में लाकर रख
दिया । उस वक्त मेरी उम्र सिर्फ नौ साल की थी और में चौथी कक्षा में
पढ़ता था ।
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