श्री योगेश्वरजी की आत्मकथा

उजालों की ओर

'प्रकाश ना पंथे' का हिन्दी भावानुवाद

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उजालों की ओर

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११. आश्रमजीवन की अन्य बातें

 

आत्मकथा लिखने की प्रवृत्ति बढ़ रही है । अपने आप में यह एक अच्छी बात है । अलग अलग विषयों पर लिखी ऐसी किताबें मनुष्य के जीवन-संघर्ष व नीज स्वभाव की कई विशेषताएँ निकालकर बाहर लाती है । मैं उसका स्वागत करता हूँ । बहुत सारे लोग ये मानते हैं कि जिसने अपने जीवन में कुछ हासिल किया हो वो ही अपनी जीवनी लिख सकता है, आम आदमी नहीं । ये बात गलत है । आम आदमी के जीवन में भी विशेषताएँ होती है जो ओरों के लिए प्रेरणा की सामग्री बन सकती है । इसी वजह से अगर आम आदमी अपनी जीवनी लिखने की कोशिश करे तो उसका स्वागत होना चाहिए ।

जीवनकथा का लेखन कोई खेल या मनोरंजन की चीज नहीं, उसका उपयोग दिलबहलाव या आत्मविज्ञापन के लिए नहीं होना चाहिए । वो तो अपने आप में एक तपस्या है, जीवन की शुद्धि की साधना है । जीवन को उच्च बनाने के लिए उसका उपयोग होना चाहिए । जो आदमी अपने बीते हुए जीवन के बारे में नहीं सोचता, उससे सिखने का प्रयत्न नहीं करता, वह कदाचित ही उपर उठ सकेगा । चिंतन करना हमेशा लाभदायी है । हाँ, उसे शब्दों में बयाँ करना आवश्यक नहीं, वो आदमी की रुचि पर निर्भर करता है । मेरा कहने का ये मतलब है कि जिवन के समुचे विकास के लिए हमें चिंतन-मनन की प्रक्रिया में जुट़े रहना चाहिए ।

आत्मकथा लिखना अपने आप में एक कला है । लेखक को सावधान रहके उतना ही पेश करना है जो सच हो । अपने आप को बड़े या छोटे बताने से उसको बचना है । उसे न तो आत्म-प्रशस्ति करना है, न आत्मनिंदा । वास्तविकता से जुड़े रहेकर, स्वयं का विवेचक बनना है और अपनी बात कहनी है । मैं भी कुछ ऐसी ही दृष्टि से यहाँ अपनी जीवनकथा प्रस्तुत कर रहा हूँ ।

जैसे की मैने बताया कि आश्रम में हमे अपने बरतन व कपड़े खुद धोने पडते थे, सुबह में पांच बजे उठकर ठंड़े पानी से नहाना पड़ता था, ये सब मुझे उस वक्त अच्छा नहीं लगता था लेकिन बाद में वो आदतें मेरे लिए लाभदायी सिध्ध हुई । आश्रमजीवन के बाद मेरे नसीब में हिमालय में रहना मुकऱर हुआ था और अगर ये आदतें मैंने न ड़ाली होती तो वहाँ रहना निश्चित ही कठिन होता । आश्रम-जीवन की आदतें मुल्यवान साबित हुई इसलिए मुझे कभी लगता है कि आश्रमजीवन की तालिम सभी के लिए होनी चाहिए ।

जिसे साधना करनी है उसे सुबह जल्दी उठना चाहिए । आश्रम के दिनों में सुबह जल्दी उठने की आदत ने यहाँ मेरा काम आसान कर दिया । स्वच्छता की ओर मेरे लगाव की वजह भी आश्रम के दिनों ड़ाली गइ नींव थी । मेरे हिमालय निवास के दौरान लोग अक्सर ये बात करते कि साधु गंदा रहें या स्वच्छ क्या फर्क पडता है ? मुझे देखकर लोग सोचते कि मैं श्रीमंत हूँ इसलिए स्वच्छ रहना पसंद करता हूँ ।  हकीकत तो ये थी कि आश्रम जीवन के दौरान मुझमें ये आदतें डाली गई थी और वहाँ गंदकी के लिए हमें दंड मिलता था । ऐसे माहोल में मैंने जीवन के कई साल व्यतीत किये । फिर जब मैं हिमालय गया तो भला स्वच्छता की उपेक्षा कैसे कर सकता ? साधु गंदा रहता है और उसे गंदा ही रहना चाहिए ऐसा मैं नहीं मानता । जो शुद्धि के स्वामी परमात्मा की उपासना करता है वह खुद भला कैसे गंदा रह सकता है ? साधना औऱ साधुजीवन के बारे में लोगों में जो गलत ख्याल है उसे बदलने की आवश्यकता है ।

और ये जरुरी थोडा है कि जो पैसेवाला हो वो ही स्वच्छ रह सकता है ? गरीब स्वच्छ हो सकता है और श्रीमंत गंदा भी । स्वच्छता कोई श्रीमंत की जागीर नहीं, वो तो सबकी संपत्ति होनी चाहिए । केवल उसके लिए रुचि और प्रयत्न करने की आवश्यकता है । विशेषतः हिमालय के इस प्रदेश में जहाँ गंगा बहती है, लोग नहाने व कपड़े धोने का काम भी हररोज नहीं करते । उसमें मुख्य प्रश्न अपनी आलस का है नहीं के अमीर या गरीब होने का । लोग चाहे मेरे बारे में कुछ सोचे, मैं हमेंशा स्वच्छता का पूजारी रहा और मुझे इस बात का आनंद और गर्व है । स्वच्छता की भेंट आश्रम जीवन की देन थी ।

 आश्रम के दिनों में मुझे क्रिकेट का शौक था लेकिन इतना ज्यादा भी नहीं । कभी कभी फुरसत के समय में मैं वो खेलता । कसरत सिखाने के लिए हररोज सुबह आश्रम में व्यायाम-शिक्षक आते थे । वो कसरत के अलावा दंड-बैठक, भालाफेंक, गोलाफेंक, लेजीम, लकडीपट्टा, बोक्सिंग व शूटिंग की तालीम भी देते । करीब चौदह साल की आयु तक मेरी उनमें ज्यादा दिलचस्पी नहीं थी । उस बक्त तिलक महाराज के जीवन का एक प्रसंग मेरे पढ़नेमें आया । तिलक महाराज का शरीर कमजोर था मगर उन्होंने ठान ली और दंड-बैठक करना शुरु किया । कुछ ही समय में उसका परिणाम सामने आया और उनका शरीर मजबूत व निरोगी हो गया । इस बात को पढकर मुझ में भी कुछ बदलाव आया । उन दिनों एक और किताब 'झंडाधारी' मेरे पढ़ने में आयी । वो महर्षि दयानंद सरस्वती की जीवनकथा थी । उनमें महर्षि के अदभूत शरीर-सौष्ठव व सामर्थ्य की कई बातें लिखी गई थी । ये सब पढ़कर मुझे लगा की शरीर की उपेक्षा करना ठीक नहीं है । अगर जीवन में कुछ बनना हो और किसी और की सेवा करनी हो तो खुद का आरोग्य अच्छा होना चाहिए । आरोग्य न केवल शरीर को सुंदर बनाने के लिए जरुरी हैं मगर आत्मिक साधना के लिए भी उतना ही आवश्यक है । स्वास्थ्य का अनादर करके आत्मिक उन्नति हासिल करने का प्रयत्न करना मूर्खता होगी ।

ऐसा सोचने पर मेरे मन में कसरत करने के लिए उत्साह पैदा हुआ । वैसे भी मेरा शरीर दुबला-पतला था और मुझे सरदर्द रहता था । उस दौरान मैंने योग के कुछ ग्रंथ पढे । योगीओं के जीवन की किताबें भी पढ़ी और मन-ही-मन महापुरुष बनने की ठान ली । जीवन में कुछ बनने के लिए शरीर को मजबूत करना अति आवश्यक लगा । फिर तो क्या कहना ? मैंने आसन-प्राणायम व दंड-बैठक का प्रारंभ किया । सूर्यनमस्कार व शीर्षासन करना भी शुरु किया । कसरत की ओर मेरी उदासीनता हमेंशा के लिए चली गई और उसका प्यार दिन-ब-दिन बढ़ता गया । नतीजा यह निकला की मेरे शरीर का ठांचा बदल गया और मेरा सरदर्द हमेशा के लिए गायब हो गया । कसरत करने से न केवल तन बल्कि मन को भी अच्छा लगा । शरीर और मन आपस में जुड़े हुए हैं इसलिए शरीर के स्वस्थ होने से मन को अवश्य लाभ होता है । मुझे कोई पहलवान होने की, हाथी जैसे बल की, या असाधारण खाने की इच्छा नहीं थी । मेरी दिलचस्पी तो स्वस्थ और निरोगी शरीर में थी और मुझे कसरत से लाभ हुआ । इसलिए मेरा सब भाई-बहनों को नम्र निवेदन है की अपने आरोग्य को कभी नजरअंदाज मत करो और अपने शरीर को स्वस्थ व निरोगी रखने के लिये पुरुषार्थ करो ।

मैं तो यहाँ तक कहेना चाहूँगा कि जहाँ जहाँ छात्रालय व छात्रों के रहने की व्यवस्था है वहाँ व्यायाम शिक्षा का प्रबंध हो । छात्रालय केवल छात्रों के ठहरने के स्थान नहीं है मगर उनके समुछे विकास का स्थल है । इसीलिए छात्रालय के संस्थापक और छात्रों के मातापिता का कर्तव्य है कि वो बच्चों में आरोग्य और कसरत की नीँव ड़ाले । उसमे लाभ उनको ही होगा ।

 

 
 

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