श्री योगेश्वरजी की आत्मकथा

उजालों की ओर

'प्रकाश ना पंथे' का हिन्दी भावानुवाद

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आमुख

स्वागत

०१. आत्मकथा क्यों ?

२६. जीवनशुद्धि की साधना
२. प्रारंभ २७. युवती से संबंघ की असर
०३. योगभ्रष्ट पुरुष २८. आकर्षण का अर्थ

०४. जन्म

. संस्था से विदाय
. रुखीबा की स्मृति

३०. लग्न की समस्या-

०६. चिता का उपदेश . लग्न की समस्या-

०७. मेरे मातापिता

३२. जी. टी. बोर्डिंग होस्टेल में
. पिताजी की मृत्यु ३३. योगाभ्यास की रुचि
०९. बंबई आश्रम में ३४. संतपुरुषों का समागम
१०. बंबई आश्रम में - २ ३५. गांधीजी का दर्शन
११. आश्रमजीवन की अन्य बातें ३६. केश में से दुध का चमत्कार
१२. सत्याग्रह की झाँकी और लेखन की रुचि ३७. साहित्य की अभिरुचि
१३. प्रारंभ की अरुचि ३८. बंबई को अलविदा
१४. गृहपति के लिए प्रार्थना ३९. बडौदा में
१५. गीतापठन की असर ४०. महर्षि अरविंद को पत्र
१६. जीवनविकास की प्रेरणा ४१. हिमालय जाने का निर्णय
१७. जीवनचरित्रों के पठन का प्रभाव ४२. भिक्षु अखंडानंद से भेंट -१
१८. परिवर्तन ४३. भिक्षु अखंडानंद से भेंट -२
१९. दिव्य प्रेम की मस्ती में ४४. भिक्षु अखंडानंद की सहाय
२०. दो विभिन्न दशाएँ ४५. हिमालय के लिए प्रस्थान
. प्रेत की बात ४६. हरिद्वार में
. साँप का स्वप्न ४७. ऋषिकेश में आगमन
२३. सरस्वती का स्वप्नदर्शन ४८. स्वामी शिवानंद से भेंट
२४. भगवान बुद्ध का दर्शन . अलौकिक अनुभव
२५. एक युवती का परिचय ५०. ऋषिकेश से विदाय

(Translation of Shri Yogeshwarji's autobiography entitled 'Prakash Na Panthe')

 

 

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