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ईश्वर का दर्शन

प्रश्न – क्या ईश्वर आसानी से मिलते हैं या मुश्किल से ॽ
उत्तर – इसके उत्तर का आधार आप पर है । अगर आप उनके लिये आतुर हृदय से तडपते और तरसते होंगे तो वे आपको आसानी से मिल जाएँगे । श्री रामकृष्ण परमहंसदेव ने तो यहाँ तक कहा है कि कलियुग में मनुष्य यदि तीन ही दिन ईश्वर को सच्चे दिल से प्रार्थना करे तो ईश्वर उसे मिल सकते हैं । ऐसे महान संतपुरुष की वाणी कभी गलत नहीं हो सकती । किंतु इसके लिये ऐसी व्याकुलता की आवश्यकता है । ईश्वर के लिए कार्य करने की शक्ति चाहिए, तमन्ना चाहिए । ये सब न हो और अत्यंत मन्द गति से गाडी चलती हो तो वह ईश्वर के समीप कब पहूँचेगी ॽ आप ही कहीए ॽ ऐसे मनुष्य को अनेक जन्म लग जाएँगें । अतएव ईश्वर आसानी से मिलते हैं या मुश्किल से यह प्रश्न ही बेकार है । जिसे ईश्वर प्राप्त करना हो वह ऐसे प्रश्न नहीं करेगा । वह तो ईश्वर के लिये कितना ही समय क्यों न चला जाए, कैसा भी त्याग क्यों न करना पडे तो भी वह तैयार ही रहेगा । वह अपना काम किये जायेगा । सागर में मोती लेने के लिये डूबकी लगानेवाले लोग मोती कितनी भी गहराई में है उसका विचार नहीं करते । वे तो गोता लगा देते हैं और मोती लेकर ही बाहर आते है । एक कामी पुरुष की कथा आपने सुनी न होगी तो पढी अवश्य होगी । वह नदी में तैरते हुए शब को नैया मानकर नदी के उस पार उतर गया और साँप को रस्सी समझकर, उसे पकडकर घरके उपर चढ गया । यह बात सच्ची हो या झूठी, समझने की बात यही है कि क्या आपमें उतनी तडपन या तमन्ना ईश्वर को मिलने के लिए है ॽ इसे ही प्रेम या विकलता कहते हैं । इनकी आवश्यकता है । इतना होने पर ईश्वर आसानी से मिल सकते हैं ।

प्रश्न – वर्तमानयुग में किसी को ईश्वर का दर्शन होना संभव है ॽ
उत्तर – क्यों नहीं ॽ वर्तमान युग में भी ईश्वर का दर्शन हो सकता है । ईश्वर के दर्शन में कोई काल, कोई समय अवधि बाधा नहीं बन सकती ।

प्रश्न – परंतु यह तो घोर कलियुग है ।
उत्तर – तो क्या हुआ ॽ सृष्टि में बाह्य रूप से भले ही कलियुग हो, आपके मन में, आपके अंतर में, आपके अंतरंग जीवन में कलियुग न हो यही देखना आवश्यक होता है । यदि आपके मन अंतर में, आपके जीवन में कलियुग के दोष नहीं है तो आपकी जीवनयात्रा का रास्ता आपको साफ नज़र आएगा । और आज के इस घोर कलियुग में भी आप अपने आपको, अपने जीवन को पवित्र एवम् निष्कलंक रख पाऐंगे ।

प्रश्न – क्या एसा जीवन कठिन नहीं होगा ॽ
उत्तर – कठिन हो या न हो परंतु असंभव तो नहीं है । इसलिए उसमें आशा रही हुई है । चारों ओर विरोधी और प्रतिकूल वातावरण हो, जीवन की अमर्याद प्रतिकूल परिस्थितियों के बीच जीवन व्यतीत करना कठिन होता है यह सत्य है किन्तु उसके लिए प्रामाणिक प्रयत्न भी करना चाहिए । आज तक अनेक सिद्ध पुरुषों ने, महात्माओं ने ऐसे अनेक प्रयोग किए हैं, और उसमें उन्होंने सफलता भी प्राप्त की है । आप भी सफलता प्राप्त कर सकते हैं । कलियुग की एक और विशेषता भी है । कलियुग के बारे में शास्त्रों, पुराण एवम् महापुरुषों ने सर्वसंमत स्वर से यह कहा है कि कलियुग जैसा अन्य कोई युग आनेवाला नहीं है । उसमें जीव यदि चाहे तो ईश्वरकृपा से स्वयं का कल्याण शीघ्रता से कर सकता है । कलियुग में दोष या दूषणों की मात्रा ज्यादा है तो उससे मुक्ति प्राप्त करने की दिशाएँ और अवसर भी अधिक हैं । अतः हमें निराश होकर, धैर्य गवाँकर स्वयं को या अन्य को दोषी मानकर बैठे रहने की जरूरत नहीं है । ऐसी परिस्थिति में से भी मार्ग निकल सकता है । उसके लिए कोशिश करने के अलावा हम और कर भी क्या सकते है ॽ समय कितना ही प्रतिकूल क्यों न हो, हमे उस समय से ही काम लेना है । ये न भूलें कि हम वक्त को परिवर्तन करने की ताकत रखते है । हालात को बदलने के लिए हम व्यक्तिगत या समष्टिगत साधना का आधार ले सकते हैं परन्तु यह समय के साथ रहकर ही संभव हो सकेगा । जब तक हम हमारे प्रयासों में कामयाब नहीं हो जाते, हमारे पास विषम वायुमंडल में साँस लेने के अलावा कोई चारा नहीं है । हमें सिर्फ यह देखना है कि ये हमारे लिए घातक नहीं परंतु जीवनप्रदायक बनें, दुःखदायक नहीं परंतु सुखदायक बने । यदि हम ऐसा कर पाए तो हमारे लिए अनावश्यक चिन्ता और भय रखने का कोई कारण नहीं है ।

प्रश्न – आपने जो भी कुछ कहा यह सब सुनने में तो आनंद आता है परन्तु वास्तविकता की धरती पर जब कदम रखते हैं तो हिम्मत टूट जाती है । ऐसा क्यों ॽ
उत्तर – आपको नाहिम्मत क्यों बनना चाहिए ॽ किस बात का भय है ॽ

प्रश्न - चारों ओर वातावरण ही जब इतना विरोधाभासी, विपरीत, प्रतिकूल या विषमय हो तो भयभीत होना स्वाभाविक है । कभी कभी तो ऐसी परिस्थिति में से मार्ग निकालना मुश्किल हो जाता है । ऐसा क्यों ॽ
उत्तर – ऐसे समय में, ऐसी परिस्थितिओं में भयभीत, नाहिम्मत होना सही नहीं है । यह अनुचित, अयोग्य होगा । विवेक, हिम्मत, धैर्य और निरंतर प्रयत्नों से प्रार्थना के माध्यम से यदि शांतिपूर्ण रूप से मार्ग ढूँढने का प्रयास करोगे तो तुरन्त ही ना सही, कभी ना कभी सफलता तो प्राप्त होगी । आज तक ऐसे कई महात्माओं ने, साधकों ने ऐसे ही सफलता प्राप्त की है ।

- © श्री योगेश्वर (‘ईश्वरदर्शन’)

 

Today's Quote

The flower which is single need not envy the thorns that are numerous.
- Rabindranath Tagore

prabhu-handwriting

Shri Yogeshwarji : Canada - 1 Shri Yogeshwarji : Canada - 1
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
Shri Yogeshwarji : Canada - 2 Shri Yogeshwarji : Canada - 2
Lecture given at Ontario, Canada during Yogeshwarjis tour of North America in 1981.
 Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA Shri Yogeshwarji : Los Angeles, CA
Lecture given at Los Angeles, CA during Yogeshwarji's tour of North America in 1981 with Maa Sarveshwari.
Darshnamrut : Maa Darshnamrut : Maa
The video shows a day in Maa Sarveshwaris daily routine at Swargarohan.
Arogya Yatra : Maa Arogya Yatra : Maa
Daily routine of Maa Sarveshwari which includes 15 minutes Shirsasna, other asanas and pranam etc.
Rasamrut 1 : Maa Rasamrut 1 : Maa
A glimpse in the life of Maa Sarveshwari and activities at Swargarohan
Rasamrut 2 : Maa Rasamrut 2 : Maa
Happenings at Swargarohan when Maa Sarveshwari is present.
Amarnath Stuti Amarnath Stuti
Album: Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji; Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
Shiv Stuti Shiv Stuti
Album : Vande Sadashivam; Lyrics: Shri Yogeshwarji, Music: Ashit Desai; Voice: Ashit, Hema and Aalap Desai
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