Swargarohan | સ્વર્ગારોહણ

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शिरडी के समर्थ संतशिरोमणी श्री सांईबाबा को कौन नहीं पहचानता ? ब्रह्मलीन बाबा की अमोघ, असाधारण शक्ति का अनुभव अनेकों को हुआ है । सन १९१८ में समाधि लेने के बाद आज पर्यं तक अनेकों को प्रेरणा प्रदान कर उनके जीवनपथ को उजागर किया है । मुझे उनकी ऐसी शक्ति का लाभ कई बार मिला है । इसका वर्णन मैंने कई बार किया है । यहाँ एक और घटना का उल्लेख करने का लोभ संवरण नहीं कर सकता ।

बंबई से शिरडी जाने का रास्ता उस वक्त इतना आसान नहीं था । आज तो स्पेशियल बस सर्वीस शुरु हुई है । उस समय तो बडी परेशानी होती थी । फिर भी बाबा की प्रेरणा से शिरडी यात्रा मैंने कई बार की ।

सात साल पहले एक बार मुझे शिरडी जाना हुआ तो मैंने समाधि स्थान में खडे होकर मेरे साथे आये हुए भाईबहन सुने इस तरह सांईबाबा को संबोधित करते हुए कहा, ‘बाबा, आज तक तो आपकी प्रेरणा या सूचना के मुताबिक मैं यहाँ आया हूँ, किन्तु अब मुझे खयाल आता है कि इतना कष्ट उठाकर मुझे यहाँ क्यों आना चाहिए ? अन्य लोग तो किसी उम्मीद या जिज्ञासा के कारण आते हैं पर मुझे तो ऐसी कोई आवश्यकता नहीं । अब तो आप यहाँ आने की प्रेरणा करेंगे तो भी नहीँ आउँगा । अगर आप मुझे यहाँ बुलाना चाहते हैं तो आपको मेरे लिए मोटरकार की व्यवस्था करनी पडेगी । तभी मैं आऊँगा । आपके लिए कुछ भी नामुमकिन नहीं ।’

ऐसा कहकर सांईबाबा को वंदन करके हम वापस लौटे । इस घटना को हुए तीन साल बीत गये । इस बीच शिरडी जाने की सूचना मिली लेकिन अब वैसे ही थोडे जा सकता हूँ ? बिना मोटरकार भेजे मैं कैसे जाऊँ, मेरी शर्त का क्या ?

बंबई के एक-दो परिचित सदगृहस्थों से अप्रत्यक्ष रूप से बातचीत की पर बंबई के बाहर मोटर भेजने के लिए वे तैयार नहीं हुए । मुझे विश्वास था की बाबा किसी के दिल में प्रेरणा करके निर्धारित कार्य पूरा कर देंगे । उस वक्त वालकेश्वर स्थित आरोग्य-भवन में मेरा सत्संग-प्रवचन चलता था । इसमें एक भावुक बहनजी भी आती थी । उनकी आर्थिक हालत अच्छी थी । प्रवचन के बाद एक बार उन्होंने कहा, ‘आप कहीं बाहर घूमने नहीं जाते?’

‘क्यों ? मैं तो हररोज जाता हूँ ।’ मैंने उत्तर दिया ।

‘पैदल जाते हैं ?’

‘हाँ, प्रायः पैदल ही जाता हूँ । कभीकभी बहुत दूर जाना हो तब टेक्सी कर लेता हूँ ।’

‘मुझे भी सेवा का अवसर दिजीये न ! मेरी मोटर है । आपके कहने पर मेरा ड्राईवर आपको घूमने ले जायेगा ।’

‘देखूँगा,’ मैंने संक्षेप में कहा ।

बाद में भी दो-तीन बार बहनजी ने मोटर के लिए कहा । उनका आग्रह व प्रेम देखकर एक बार मैंने साफ-साफ बात की, ‘मुझे मोटर की आवश्यकता है किन्तु बंबई में घूमने के लिए नहीं, शिरडी जाने के लिए ।’

‘कितने दिनों के लिए ?’

‘तीन-चार दिनों के लिए ।’

यह सुनकर बहनजी बोली, ‘मोटर आपकी है । मैं घर जाके उनको पूछुंगी । वे ना नहीं कहेंगे।’

‘तुम पूछकर उत्तर दे देना ।’

बहनजी गईं । मुझे लगा कि सांईबाबा ने हमारी इच्छानुसार तैयारी करने की शुरुआत की है वरना साधारण परिचयवाली यह बहनजी इतने प्यार से मोटरकार के लिए क्यूँ कहेगी ?

परंतु तीन-चार दिन तक वह बहनजी न दिखाई दी । उनके निकट रहनेवाली एक बहनने कहा, ‘वह तो बडी मुसीबत में फँस गई है ।’ फिर उसने विस्तार से कहा : जब उन्होंने पतिदेव से मोटर देने के लिए कहा तो वे लालपीले हो गए और कहने लगे, ‘साधुसंतो के लिए कार नहीं खरीदी है, समझी ? और हाँ, आज से तुझे सत्संग में भी नहीं जाना है ।’

मैं पूरी बात समझ गया । कुछ सज्जन कहने लगे, ‘इससे तो बहेतर है कि रेलगाडी से जाए । रीझर्वेशन करवा लेंगे तो कोई तकलीफ नहीं होगी ।’ लेकिन मेरे मन का समाधान नहीं हुआ ।

*
तीन-चार दिन बाद वह मोटरवाली बहनजी सत्संग में आने लगी लेकिन उन्होंने मोटर की बात नहीं छेडी । मुझे भी इस बारे में पूछना ठीक न लगा । मैंने सोचा कई बार मनुष्य की इच्छा या भावना होने पर भी प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण उसका आचरण नहीं हो पाता ।

दो-तीन दिन और गुजर गये । चौथे दिन सत्संग की समाप्ति के बाद बहनजी ने पूछा, ‘आपको सचमुच शिरडी जाना है क्या ?’

‘हाँ, लेकिन ऐसा क्यों पूछती हैं ?’

‘आपको मोटर कब चाहिए ?’ मैं थोडी देर उनकी ओर देखता रहा और बोला, ‘जब मिले तब, इतवार को भी चलेगा, परंतु क्या तुम्हारी मोटर मिलना मुमकिन है ?’

‘हाँ, पहले तो उन्हों ने गुस्से होकर साफ इन्कार किया था लेकिन आज न जाने क्या हुआ, उन्होंने मोटर देने की संमति दे दी । इतने में वे सज्जन भी आ पहुँचे । इतवार को शिरडी जाना तय होने पर मैंने पेट्रोल खर्च देने को कहा तब वे बोले, ‘हम भला आप जैसे साधुपुरुष से पेट्रोल का खर्च लेंगे ? संतसेवा का लाभ ही सच्चा धन है । हाँ, ड्राईवर चाय का रसिया है, उसे चाय जरूर पिलाना !’

‘इस बारे में आप निश्चिंत रहिये, पर आपको दो-तीन दिन तकलीफ होगी ।’

‘कोई हर्ज नहीं । मैं इतवार को ग्यारह बजे ड्राईवर के साथ मोटर लेकर आ पहुँचूंगा ।’

*
इतवार के दिन हम मोटर में शिरडी जाने निकले तब उस सज्जन ने कहा, ‘आराम से यात्रा कीजियेगा ।’

उस बहनजी की आँखे भर आई । उनके पतिदेव का मन-परिवर्तन करनेवाले और मेरा निर्धार सफल करनेवाले सांईबाबा ही थे । उनकी असाधारण अगम्य शक्ति का ही यह नतीजा था ।

शिरडी के समाधि मंदिर में सांईबाबा की प्रतिमा के सामने खडे होकर, दोनों हाथ जोडकर मैंने उनको धन्यवाद देते हुए कहा, ‘अच्छा है आप मुझे मोटर में यहाँ लाये, फिर भी ऐसा अवश्य करना की प्रत्येक परिस्थिति में आपके प्रति मेरा प्रेमभाव बना रहे ।‘

प्रतिमा सजीव-प्राणवान हुई । मानों मेरे शब्द सुनकर सांईबाबा मुस्कराने लगे !

- श्री योगेश्वरजी