सन १९७० का साल 'गांधी शताब्दि वर्ष' मनाने की घोषणा हुई । इसके उपलक्ष में भारत तथा विदेशों में कई कार्यक्रमों का आयोजन किया गया । महात्मा गांधी का योगदान केवल भारत तक सिमीत नहीं था, वो तो समस्त संसार के लिये मूल्यवान था । उनका मुख्य कार्यक्षेत्र भले भारत रहा, मगर उनकी गतिविधिओं से समस्त संसार के लोग प्रभावित हुए थे । भारत के करोंडो लोगों की मुक्ति, शांति तथा समृद्धि के लिये उन्होंने एतिहासिक कार्य किया था । इसलिये वो एसी अंजलि के हकदार थे । उनके विराट व्यक्तित्व से प्रेरणा ग्रहण करना स्तुत्य और आवकारदायक होगा ।
मैंने अपने तरीके से गांधीजी को अंजलि देने की योजना बनायी । गांधीजी के देहत्याग बाद मैंने उनके जीवन और कार्यों पर आधारित 'गांधी गौरव' नामक महाकाव्य की रचना की थी । शताब्दि वर्ष के दौरान उसमें आवश्यक संशोधन-संवर्धन करके उसे प्रकाशित करने की मेरी अभिलाषा थी । उसे सार्थक करने के लिये मैंने अथाक परिश्रम करके काव्यकृति को मठारा और संपूर्ण किया । इसके लिये मुझे गांधीजी के जीवन पर आधारित कई ग्रंथो का पठन करना पडा । जिस तरह तुलसीदास ने भगवान राम के प्रति अपनी प्रेम और श्रद्धा प्रदर्शित करने रामचरितमानस की रचना की थी, मैंने गांधीजी के लिये अपने स्नेह की अभिव्यक्ति करने के लिये गांधीगौरव की रचना की । एसा करने से मुझे गहरा आत्मसंतोष मिला । मुझे लगा की मैंने अपना फर्ज अदा किया है ।
मैं चाहता था की शताब्दी वर्ष के दौरान कोई ख्यातनाम प्रकाशनगृह द्वारा 'गांधी गौरव' की प्रसिद्धि हो मगर एसा करना आसान नहीं था । फिर भी मुझे विश्वास था की जो परम शक्ति ने मुझसे एसी सुंदर काव्यकृति का सर्जन करवाया है, वो इसके लिये आवश्यक प्रबंध करेगी । मैंने परमात्मा से प्रार्थना करके गांधीजी का मार्गदर्शन माँगा ।
एक सुबह गांधीजी ने मुझे दर्शन दिया ।
मैंने पूछा, 'आपको मेरा 'गांधी गौरव' महाकाव्य पसंद आया ?'
उन्होंने प्रत्युत्तर दिया: 'क्यूँ नहीं ? मेरे लिये इतने प्रेम से कौन लिखता है ? मुझे याद भी कौन करता है ? मैं आपके 'गांधी गौरव' से बेहद प्रसन्न हूँ ।'
'मगर उसे कौन प्रकाशित करेगा ? मैं चाहता हूँ की कोई जानीमानी संस्था इसे प्रकाशित करें । क्या वोरा एन्ड कंपनी करेगी ?'
'नहीं, वो नहीं करेगी ।'
'आर. आर. शेठ की कंपनी ?'
'वो भी नहीं ।'
'तो फिर कौन इसे प्रकाशित करेगा ?'
'नवजीवन कार्यालय ।'
'मगर नवजीवन केवल गद्य साहित्य का प्रकाशन करती है, पद्य साहित्य नहीं ।'
'आप कोशिश तो करो, वो अवश्य उसे प्रकाशित करेगा ।'
जब गांधीजी ने कह दिया तो दलील करना फिजूल था । मैंने इस विषय को वहीं विराम दे दिया ।
सन १९६० में 'गांधी गौरव' के लिये मैंने नवजीवन कार्यालय को खत लिखा था, और उनकी सूचनानुसार हस्तप्रत भेजी थी मगर वो वापिस आयी थी । अब गांधीजी ने निर्देश दिया, इसलिये मैंने फिर-से पत्रव्यवहार शुरु किया । मैंने वोरा एन्ड कंपनी तथा अन्य दो-तीन प्रकाशन संस्थाओं को खत लिखा मगर उनका जवाब ना आया ।
मैंने नवजीवन संस्था के नाम चिठ्ठी लिखी, जिसमें 'गांधी गौरव' का संक्षिप्त परिचय लिखा था । संस्था के ट्रस्टी का जवाब आया की वैसे तो हम पद्य साहित्य का प्रकाशन नहीं करते है । आपने गांधीजी के जीवन पर महाकाव्य लिखा है, यह जानकर हमें खुशी हुई । हरकत न हो तो उसकी एक हस्तप्रत हमें भेज दो । उनके उत्तर से प्रोत्साहित होकर मैंने उनको हस्तप्रत भेज दी ।
एक बार फिर, गांधीजी से इस विषय पर वार्तालाप हुआ ।
'गांधी गौरव' की प्रस्तावना किसके पास लिखवाउँ ?'
'अगर प्रस्तावना लिखवानी है तो काका कालेलकर के पास लिखाओ, वो ठीक रहेगा ।'
'मोरारजी देसाइ के पास कुछ लिखवाउँ ?'
'हाँ, वो भी मना नहीं करेंगे ।'
मैंने काका कालेलकर को खत लिखकर 'गांधी गौरव' के लिये कुछ लिखने की प्रार्थना की । उन्होंने काव्यों की प्रस्तावना लिखना बन्द किया था । उनकी आँखे कमजोर हो गयी थी । फिर भी उन्होंने हस्तप्रत मँगवाकर अपना अभिप्राय लिख भेजा । श्री मोरारजी देसाई ने भी अपनी अनेकविध व्यस्तताओं के बावजूद प्रत्युत्तर दिया । उसमें लिखा था की जैसे जैसे 'गांधी गौरव' छपता है, मुझे फरमा भेजते रहेना । मैं आपको अपना अभिप्राय लिखकर भेज दूँगा ।
नवजीवन प्रकाशन के पास 'गांधी गौरव' की हस्तप्रत करीब तीन महिने तक रही । उस दौरान कई जानेमाने साहित्यकार, तथा गांधी विचारकों ने इसका मूल्यांकन किया । आर्थिक रूप से गांधी गौरव का प्रकाशन करना ठीक रहेगा या नहीं – इसके बारे में चर्चा हुई । आखिरकार संस्था ने इसे प्रकाशित करने का निर्णय लिया । जब मुझे इसकी माहिती मिली तो मेरी खुशी का ठिकाना नहीं रहा । गांधीजी की इच्छा और प्रेरणा का विजय हुआ । महापुरुष चाहे स्थूल रूप में हो या सूक्ष्म रूप में, उनके संकेत और उनके वचन हमेशा सत्य सिद्ध होते है ।
श्री मोरारजी देसाई ने समयानुसार आमुख लिखकर भेज दिया । मेरी इच्छा के मुताबिक 'गांधी गौरव' गांधीजी के शताब्दि वर्ष में प्रकाशित हुआ । इससे मेरी प्रसन्नता का पार नहीं रहा ।
नवजीवन प्रकाशन के मेनेजिंग ट्रस्टीने बातो-बातों में मुझे कहा: 'गांधी गौरव' के लिये हमने बहुत सोचविचार किया । हमें कल्पना नहीं थी की लोग इसे इतना पसंद करेंगे । विद्वानों ने इसकी प्रसंशा की है, विवेचकों ने अच्छा विवेचन किया है । साहित्य और कविता – दोनों दृष्टि से आपकी रचना उच्च कोटि की है ।
इससे ज्यादा आत्मसंतोष और क्या हो सकता है ? 'गांधी गौरव' के पीछे जो प्रेरणा थी, इसका प्रामाणिक आलेखन करते हुए आज मेरा हृदय अवनवीन भावों का अनुभव कर रहा है ।

