जीवन में कुछ मुलाकातें एसी होती है जो हमेशा के लिये अपनी छाप छोड जाती है । ११ अक्तूबर १९७२ के दिन उडीयाबाबा से हुई मुलाकात एसी ही चिरस्मरणीय थी । आज फिर-से उसकी याद ताजा करते हुए मुझे हर्ष हो रहा है ।
बदरीनाथ और केदारनाथ की यात्रा समाप्त करके हम देवप्रयाग लौटे थे । देवप्रयाग के जिस स्थान में हम कई साल रहे थे, वहाँ पिछले पाँच-छे साल से, उडीसा के एकांतप्रिय महात्मा निवास करते थे । उनका नाम उडियाबाबा था । देवप्रयाग के निवासीओं से उनके तप और त्याग की प्रसंशा सुनकर हमें उनसे मिलने की इच्छा हुई ।
वहाँ जाकर देखा तो शांताश्रम की पुरानी कुटिया को जमीनदोस्त करके नयी, छोटी-सी कुटिया का निर्माण किया गया था । जब हम वहाँ गये तो उडियाबाबा कुटिया में थे । उनका शरीर साँवला और मुखमंडल बिल्कुल साधारण था । उन्हें देखकर एसा नहीं लगा की उनका व्यक्तित्व असाधारण या आकर्षक है । हालाकि उनके नेत्रों में एक अजीब शांति छायी थी, और उनके मुख पर आत्मसंतोष की आभा थी । सर पर गुच्छेदार बालों की जटा तथा मुख पर श्वेत दाढी थी । उनके पहने हुए श्वेत वस्त्र कुछ मैले लगे । पहली नजर में एसा लगा की ये कोई वैरागी साधु है । विरक्ति, साधनाप्रीति तथा इश्वरप्रेम के बिना एसे निर्जन और एकांत स्थान में लंबे अरसे तक रहना आसान नहीं है । यह सोचकर मेरे मन में उनके प्रति सदभाव पैदा हुआ । भारत में आज भी कई संतमहात्मा एसे है जो आत्मविकास की साधना में लगे है, और एकांत जगहों में रहकर अपना जीवन गुजारते है । एसे संतो का समागम सुखदायक होता है ।
उडियाबाबा ने दोनों हाथ जोडकर और मस्तक झुकाकर सबको नमस्कार किया । सामान्य रूप से संतपुरुष एसा नहीं करते । हमारे साथ आये लोगों को उनकी विनम्रता देखकर आश्चर्य हुआ । उडियाबाबा ने मुझे कहा, आप यहाँ बहुत सालों तक रहें थे, इसलिये आपको मिलने की मेरी इच्छा थी । इश्वरकृपा से आज वो पूरी हुई । जीवन में परमात्मा के अलावा कुछ जानने जैसा नहीं है । जीव उसे भूलकर विषयों में डूब जाता है और दुःखी होता है । जो परमात्मा का भजन करता है, वो सही मायने में सुखी होता है ।
फिर उन्होंने हमारे लिये पेंडे का प्रसाद मँगवाया । हमारे साथ आये भाइयोंने उनको पैसे देने चाहे मगर उन्होंने नहीं लिये । आग्रह करने पर भी वो अपनी बात पर अडे रहे ।
उन्होंने कहा, 'मुझे पैसे का क्या काम है ? भगवान की कृपा से मुझे किसी भी प्रकार की कोई तकलिफ नहीं है । आप इसे वापिस ले लो, मुझे इसकी आवश्यकता नहीं है ।'
उनकी अपरिग्रह वृत्ति और निस्पृहता प्रशंसापात्र थी । उडियाबाबा विविक्त थे, किसीसे कुछ लेते नहीं थे, तो अपना जीवननिर्वाह कैसे करते थे, एसा प्रश्न उदभव होना स्वाभाविक है । हमारे साथ जो पंडा आये थे उन्होंने बताया की उडियाबाबा गाँव में भिक्षा लेने नहीं आते, लोकसंपर्क में उनको बिल्कुल दिलचस्पी नहीं है । वो किसीसे कुछ नहीं माँगते । कोई व्यक्ति सहजरूप से उनको कुछ दें, तो वो आवश्यकतानुसार लेते है । ज्यादातर मुँग की दाल पर उनका गुजारा होता है, और वो न मिले तो पैड के पत्तों से वो अपना काम चला लेते है । उन्हें कोई अपेक्षा नहीं है । वो इश्वरपरायण होकर आकाशवृत्ति से जीते है ।
उडियाबाबा के मुख पर निस्पृहता, निःस्वार्थता तथा तपस्या का प्रभाव था, आत्मसंतोष की झलक थी । वो एक असाधारण अवस्था पर आसिन्न संतपुरुष थे, इनमें कोई दोराय नहीं ।
उनकी असाधारणता का परिचय हमें तब मिला जब हम वहाँ से निकले । हमें अलविदा कहने वो कुटिया के बाहर आये । उस वक्त मध्याह्म का समय था । कुटिया के आँगन में आकर वो मेरे पास खडे रहे । फिर उन्होंने कुछ क्षण सूर्य की ओर देखा । सूर्य के प्रखर तेज से उनकी दृष्टि चकाचौंध नहीं हुई । मन-ही-मन वो कुछ बोलने लगे, मुझे लगा की शायद वो सूर्य की उपासना कर रहे है । कुछ देर तक सूर्य की और देखने के बाद मेरी और मुडे । मुझे दो हाथ जोडकर नमस्कार किया । उनके मुख पर संमोहक स्मित था । फिर धीमे से बोले: 'आप .. हो । आप ... फिर-से आये हो ।'
इतना कहकर वो मुझसे अलग हुए । हमारे साथ आये लोग थोडी दूरी पर थे, इसलिये उडियाबाबा के शब्द मेरे अलावा किसीने नहीं सुने ।
उनके शब्द सुनकर मुझे आश्चर्य हुआ, एसा होना स्वाभाविक था । उन्हें कैसे पता चला की मैं ... हूँ । क्या उनके इष्टदेव ने उनको ये माहिती प्रदान की थी या किसी अन्य रीत से उन्हें पता चला था ? जो भी हो, उनके द्वारा दी गयी माहिती मेरे लिये मूल्यवान थी । सन १९४४ में मुझे मेरे पूर्वजन्म की माहिती मिली थी । तब से लेकर आज तक या तो सूक्ष्म शरीरधारी महात्माओं द्वारा या तो समाधिदशा में सिद्ध संतपुरुषों द्वारा मुझे यह जानकारी दी गयी थी । मगर जाग्रत अवस्था में किसी देहधारी व्यक्ति ने मुझे एसा बताया हो, एसा ये दूसरा ही प्रसंग था ।
मजे की बात तो ये है की मेरे मन में एसा विचार आया था की क्या मौजूदा भारत में कोई एसा महापुरुष है, जो मुझे देखकर मेरा पूर्वजन्म बता दें ? क्या भारत में एसे समर्थ संतपुरुष अब भी है या उनका सर्वथा लोप हो गया है ? और अगर है तो कहाँ है, किस भेष में है ? उनसे मेरी मुलाकत कब और कैसे होगी ?
इश्वर की विराट शक्ति ने मेरे विचारों का प्रत्युत्तर देने के लिये मुझे उडियाबाबा से मिलाया था, और वो भी मेरी साधनाभूमि पर, ये मेरे लिये अत्यंत आनंददायक बात थी । या तो उडियाबाबा स्वयं अपनी शक्ति से ये जान सकें थे या परमात्मा की दिव्य शक्ति ने उन्हें माध्यम बनाकर ये माहिती दी थी । जो भी हो, परमात्मा की शक्ति का माध्यम होना भी साधारण बात नहीं है । उडियाबाबा इनके लिये संपूर्ण योग्य थे ।
आज तक मैं इस प्रसंग को नहीं भूला हूँ । उनको मिलकर मुझे ये तसल्ली हुई की भारत में आज भी उडियाबाबा जैसे तपःपूत प्रतापी परमात्मपरायण महापुरुष विद्यमान है । बाह्य रूप से वो भले साधारण दिखते थे, मगर वो थे अत्यंत असाधारण, इसमें कोई शक नहीं । मैं उनको सादर वंदन करता हूँ ।

